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छपरा में कार्यकर्ताओं की बलि लेकर खुद उम्मीदवार बनीं "सिंगापुर वाली" रोहिणी आचार्या का तेजस्वी प�

Posted on June 09, 2026 by BiharTalkies
News and Politics
छपरा में कार्यकर्ताओं की बलि लेकर खुद उम्मीदवार बनीं "सिंगापुर वाली" रोहिणी आचार्या का तेजस्वी प�
छपरा में कार्यकर्ताओं की बलि लेकर खुद उम्मीदवार बनीं "सिंगापुर वाली" रोहिणी आचार्या का संकट काल के सिपाही सुनील सिंह के बहाने तेजस्वी के नेतृत्व पर प्रहार?

राजद की राजनीति में इन दिनों रोहिणी आचार्या के बयान और उनकी नाराजगी चर्चा का विषय बने हुए हैं। सुनील सिंह की उम्मीदवारी को लेकर उनकी प्रतिक्रिया ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। कई राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल एक नेता के प्रति समर्थन या विरोध का मामला नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों के रूप में देख रहे हैं।

आलोचकों का कहना है कि रोहिणी आचार्या की अपनी राजनीतिक यात्रा भी विवादों से अछूती नहीं रही है। उनका दावा है कि छपरा लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाए जाने के दौरान वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे अनेक कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई। ऐसे कार्यकर्ता, जिन्होंने लंबे समय तक पार्टी के लिए संघर्ष किया, टिकट की उम्मीद में पीछे रह गए, जबकि रोहिणी आचार्या को सिंगापुर से लाकर सीधे चुनावी मैदान में उतार दिया गया।

यही कारण है कि अब जब रोहिणी आचार्या उम्मीदवार चयन और पार्टी के निर्णयों पर सवाल उठाती दिखाई देती हैं, तो उनके विरोधियों को इसे मुद्दा बनाने का अवसर मिल गया है। आलोचकों का तर्क है कि परिवारवाद के लाभ से राजनीति में स्थापित हुई नेता द्वारा संगठन और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा पर सवाल उठाना विरोधाभासी प्रतीत होता है।

सुनील सिंह के मामले ने इस बहस को और तेज कर दिया है। राजद के कठिन दौर में पार्टी के साथ खड़े रहने वाले नेताओं में गिने जाने वाले सुनील सिंह को लेकर रोहिणी की नाराजगी को कुछ लोग सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व, विशेषकर तेजस्वी यादव के निर्णयों पर अप्रत्यक्ष हमला मान रहे हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक मंचों पर इस तरह की प्रतिक्रिया संगठनात्मक अनुशासन और नेतृत्व की स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि एमएलसी सीट को लेकर रोहिणी आचार्या की अपनी राजनीतिक अपेक्षाएं हो सकती थीं। हालांकि इस दावे के समर्थन में कोई सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनकी तीखी प्रतिक्रिया ने इस तरह की अटकलों को जन्म दिया है। आलोचक सवाल पूछ रहे हैं कि यदि मामला केवल सिद्धांत और कार्यकर्ताओं के सम्मान का था, तो विरोध इतना मुखर क्यों दिखाई दिया।

दूसरी ओर, रोहिणी आचार्या के समर्थकों का कहना है कि उनके बयान को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से जोड़कर देखना उचित नहीं है। उनके अनुसार, रोहिणी ने उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया और कार्यकर्ताओं की भावनाओं को लेकर अपनी बात रखी है, जिसे लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा माना जाना चाहिए।
फिलहाल इतना तय है कि इस पूरे विवाद ने राजद के भीतर नेतृत्व, संगठन और कार्यकर्ताओं की भूमिका को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या फिर पार्टी की आंतरिक राजनीति पर इसका कोई व्यापक प्रभाव पड़ता है।

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