बिना जनादेश मंत्री! दीपक प्रकाश पर सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा, बिहार सरकार से मांगा जवाब
Posted on June 15, 2026 by
BiharTalkies
News and Politics
बिना जनादेश मंत्री! दीपक प्रकाश पर सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा, बिहार सरकार से मांगा जवाब
पटना/नई दिल्ली:
बिहार की राजनीति में एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की दोबारा मंत्री नियुक्ति पर अब सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से संज्ञान लिया है और बिहार सरकार, दीपक प्रकाश तथा चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
याचिका का मूल सवाल सीधा है—जब कोई व्यक्ति छह महीने के भीतर विधायक या विधान परिषद सदस्य नहीं बनता, तो क्या उसे दोबारा मंत्री बनाकर संविधान की भावना को दरकिनार किया जा सकता है? याचिकाकर्ता का आरोप है कि दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री बनाना अनुच्छेद 164(4) की संवैधानिक व्यवस्था का परोक्ष उल्लंघन है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यहां तक पूछा, "क्या वह अभी भी मंत्री हैं?" यह सवाल ही इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
विपक्षी दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में मंत्री पद जनता के जनादेश से जुड़ा होता है। यदि बिना चुनाव जीते और बिना किसी सदन का सदस्य बने कोई व्यक्ति लगातार मंत्री पद पर बना रहता है, तो इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले S.R. Chaudhuri मामले का भी हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि गैर-विधायक मंत्री को मिली छह महीने की छूट स्थायी व्यवस्था नहीं है। याचिकाकर्ता का दावा है कि सरकार परिवर्तन या पुनर्नियुक्ति के जरिए इस संवैधानिक सीमा को अनंतकाल तक नहीं बढ़ाया जा सकता।
फिलहाल दीपक प्रकाश मंत्री पद पर बने हुए हैं और सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। लेकिन नोटिस जारी होने के बाद यह मामला केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति का नहीं, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की परीक्षा का बन गया है। अब पूरे बिहार की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है।
पटना/नई दिल्ली:
बिहार की राजनीति में एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की दोबारा मंत्री नियुक्ति पर अब सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से संज्ञान लिया है और बिहार सरकार, दीपक प्रकाश तथा चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
याचिका का मूल सवाल सीधा है—जब कोई व्यक्ति छह महीने के भीतर विधायक या विधान परिषद सदस्य नहीं बनता, तो क्या उसे दोबारा मंत्री बनाकर संविधान की भावना को दरकिनार किया जा सकता है? याचिकाकर्ता का आरोप है कि दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री बनाना अनुच्छेद 164(4) की संवैधानिक व्यवस्था का परोक्ष उल्लंघन है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यहां तक पूछा, "क्या वह अभी भी मंत्री हैं?" यह सवाल ही इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
विपक्षी दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में मंत्री पद जनता के जनादेश से जुड़ा होता है। यदि बिना चुनाव जीते और बिना किसी सदन का सदस्य बने कोई व्यक्ति लगातार मंत्री पद पर बना रहता है, तो इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले S.R. Chaudhuri मामले का भी हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि गैर-विधायक मंत्री को मिली छह महीने की छूट स्थायी व्यवस्था नहीं है। याचिकाकर्ता का दावा है कि सरकार परिवर्तन या पुनर्नियुक्ति के जरिए इस संवैधानिक सीमा को अनंतकाल तक नहीं बढ़ाया जा सकता।
फिलहाल दीपक प्रकाश मंत्री पद पर बने हुए हैं और सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। लेकिन नोटिस जारी होने के बाद यह मामला केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति का नहीं, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की परीक्षा का बन गया है। अब पूरे बिहार की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है।
रौशन आनंद और खान सर विवाद में NHRC सख्त। रौशन आनंद की गिरफ्तारी पर SSP को नोटिस, मांगा जवाब।
रौशन आनंद के मृत भाई पर खान सर की विवादित टिप्पणी से मचा बवाल, सोशल मीडिया में तीखी प्रतिक्रियाएं
रौशन यादव को मिली जमानत खान के वकीलों ने किया जमकर विरोध
सिवान में फिर गरमाई नियुक्ति की राजनीति, मोहम्मद कैफ ने हैप्पी यादव के पीएचडी और नौकरी पर उठाए सव�