हटाए जाने की आशंका से पहले ही पीके शाही का इस्तीफा? बिहार सरकार नीतीश की छाया से हो रही है मुक्त!
Posted on June 14, 2026 by
BiharTalkies
News and Politics
हटाए जाने की आशंका से पहले ही पीके शाही का इस्तीफा? क्या बिहार सरकार नीतीश कुमार की छाया से हो रही है मुक्त!
पटना। बिहार की सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक के बाद एक ऐसे घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुराने समर्थक और राजनीतिक शुभचिंतक बेहद चिंताजनक नजर से देख रहे हैं। ताजा मामला बिहार के महाधिवक्ता रहे पीके शाही के इस्तीफे का है। पीके शाही को लंबे समय से नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों और करीबी चेहरों में गिना जाता रहा है। वे पहले भी महाधिवक्ता रह चुके हैं और बाद में नीतीश सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी भी संभाल चुके थे।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पीके शाही ने ऐसे समय में इस्तीफा दिया है जब सत्ता और प्रशासन में व्यापक फेरबदल की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि इस्तीफे के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सत्ता के गलियारों में इसे एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
नीतीश समर्थकों का आरोप है कि पिछले कुछ समय से मुख्यमंत्री के पुराने और विश्वसनीय माने जाने वाले लोगों को धीरे-धीरे प्रभावहीन किया जा रहा है। उनका कहना है कि जिन नेताओं, अधिकारियों और सलाहकारों ने वर्षों तक नीतीश कुमार के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत किया, वे अब निर्णय प्रक्रिया से बाहर किए जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि बिहार सरकार के भीतर शक्ति संतुलन बदल रहा है। नई राजनीतिक प्राथमिकताओं और नए शक्ति केंद्रों के उभरने के बीच पुराने चेहरों की भूमिका सीमित होती दिखाई दे रही है। ऐसे में पीके शाही का इस्तीफा केवल एक संवैधानिक पद से विदाई नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी माना जा रहा है।
नीतीश कुमार के समर्थकों में इस घटनाक्रम को लेकर नाराजगी भी देखी जा रही है। उनका कहना है कि जिस नेतृत्व ने वर्षों तक बिहार की राजनीति को दिशा दी, उसी नेतृत्व के विश्वस्त लोगों को किनारे लगाने की कोशिश की जा रही है। समर्थकों का सवाल है कि यदि यही क्रम जारी रहा तो क्या आने वाले दिनों में सरकार की पहचान और राजनीतिक चरित्र पूरी तरह बदल जाएगा?
फिलहाल सरकार की ओर से इस विषय पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन इतना तय है कि पीके शाही का इस्तीफा बिहार की राजनीति में नई बहस को जन्म दे चुका है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उनकी जगह कौन लेता है और आने वाले दिनों में सत्ता के समीकरण किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।
पटना। बिहार की सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक के बाद एक ऐसे घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुराने समर्थक और राजनीतिक शुभचिंतक बेहद चिंताजनक नजर से देख रहे हैं। ताजा मामला बिहार के महाधिवक्ता रहे पीके शाही के इस्तीफे का है। पीके शाही को लंबे समय से नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों और करीबी चेहरों में गिना जाता रहा है। वे पहले भी महाधिवक्ता रह चुके हैं और बाद में नीतीश सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी भी संभाल चुके थे।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पीके शाही ने ऐसे समय में इस्तीफा दिया है जब सत्ता और प्रशासन में व्यापक फेरबदल की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि इस्तीफे के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सत्ता के गलियारों में इसे एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
नीतीश समर्थकों का आरोप है कि पिछले कुछ समय से मुख्यमंत्री के पुराने और विश्वसनीय माने जाने वाले लोगों को धीरे-धीरे प्रभावहीन किया जा रहा है। उनका कहना है कि जिन नेताओं, अधिकारियों और सलाहकारों ने वर्षों तक नीतीश कुमार के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत किया, वे अब निर्णय प्रक्रिया से बाहर किए जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि बिहार सरकार के भीतर शक्ति संतुलन बदल रहा है। नई राजनीतिक प्राथमिकताओं और नए शक्ति केंद्रों के उभरने के बीच पुराने चेहरों की भूमिका सीमित होती दिखाई दे रही है। ऐसे में पीके शाही का इस्तीफा केवल एक संवैधानिक पद से विदाई नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी माना जा रहा है।
नीतीश कुमार के समर्थकों में इस घटनाक्रम को लेकर नाराजगी भी देखी जा रही है। उनका कहना है कि जिस नेतृत्व ने वर्षों तक बिहार की राजनीति को दिशा दी, उसी नेतृत्व के विश्वस्त लोगों को किनारे लगाने की कोशिश की जा रही है। समर्थकों का सवाल है कि यदि यही क्रम जारी रहा तो क्या आने वाले दिनों में सरकार की पहचान और राजनीतिक चरित्र पूरी तरह बदल जाएगा?
फिलहाल सरकार की ओर से इस विषय पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन इतना तय है कि पीके शाही का इस्तीफा बिहार की राजनीति में नई बहस को जन्म दे चुका है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उनकी जगह कौन लेता है और आने वाले दिनों में सत्ता के समीकरण किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।
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