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बेटे-बहू की सियासत ने डुबो दी उपेंद्र कुशवाहा की सियासी नाव?

Posted on June 08, 2026 by BiharTalkies
News and Politics
बेटे-बहू की सियासत ने डुबो दी उपेंद्र कुशवाहा की सियासी नाव?
बेटे-बहू की सियासत ने डुबो दी उपेंद्र कुशवाहा की सियासी नाव?

कभी बिहार की राजनीति में खुद को बड़े विकल्प के रूप में पेश करने वाले उपेंद्र कुशवाहा आज राजनीतिक हाशिये पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। वे अब अपने बेटे के लिए एक राजनीतिक पद तक सुनिश्चित नहीं करा सके।

कुशवाहा ने वर्षों तक सिद्धांत, संघर्ष और सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति का दावा किया, लेकिन अंत में उनकी राजनीति भी परिवारवाद की भेंट चढ़ती दिखी। संगठन को मजबूत करने के बजाय परिवार को स्थापित करने की कोशिश ने उनकी साख को नुकसान पहुंचाया।

दीपक प्रकाश को एमएलसी नहीं बनाया जाना केवल एक राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि उपेंद्र कुशवाहा की घटती हैसियत का सार्वजनिक संदेश माना जा रहा है। जिस नेता की सिफारिश कभी सत्ता के गलियारों में वजन रखती थी, उसकी बात आज शायद उतनी प्रभावी नहीं रह गई है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जेडीयू छोड़कर अलग पहचान बनाने निकले कुशवाहा की राजनीति आज फिर उसी दरवाजे के आसपास भटकती नजर आ रही है। अलग पार्टी बनाई, बड़े दावे किए, लेकिन न संगठन खड़ा हो पाया और न जनाधार बढ़ पाया।

बिहार की राजनीति में कहा जाता है—"जो नेता अपने कार्यकर्ताओं से ज्यादा परिवार पर भरोसा करता है, उसकी राजनीति धीरे-धीरे सिकुड़ने लगती है।" उपेंद्र कुशवाहा का मौजूदा राजनीतिक सफर इसी कहावत की याद दिलाता है।

आज स्थिति यह है कि न वे सत्ता के केंद्र में हैं, न विपक्ष के प्रमुख चेहरे हैं और न ही अपने समर्थकों को कोई बड़ा राजनीतिक संदेश दे पा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या उपेंद्र कुशवाहा अब बिहार की राजनीति में प्रासंगिकता बचाने की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं?

उपेंद्र कुशवाहा के नजदीकी सूत्रों के अनुसार कुशवाहा अपने बेटे दीपक प्रकाश को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा रही कि वह अपनी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा को मंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन पारिवारिक दबाव के कारण बेटे को आगे करना पड़ा। जिस आशंका से वह बचना चाहते थे, आखिर वही स्थिति सामने आ गई।


नतीजा सामने है—

न परिवार को अपेक्षित राजनीतिक सफलता मिली, न पार्टी का विस्तार हुआ और न ही राजनीतिक प्रभाव बढ़ सका। बिहार की राजनीति में चर्चा है कि परिवार को आगे बढ़ाने की कोशिश में उपेंद्र कुशवाहा अपनी राजनीतिक ताकत का सही आकलन नहीं कर सके।

"परिवार बचाने की राजनीति में,
राजनीति ही कमजोर पड़ गई!"
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