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UPSC में चयनित वंचित वर्ग के बाबुओं का पहला काम अपने से उच्च वर्ण की संगिनी ढूंढना होता है- IAS नूरुल हो

Posted on March 18, 2026 by BiharTalkies
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UPSC में चयनित वंचित वर्ग के बाबुओं का पहला काम अपने से उच्च वर्ण की संगिनी ढूंढना होता है- IAS नूरुल हो

UPSC में चयनित वंचित वर्ग के बाबुओं का पहला काम अपने से उच्च वर्ण की संगिनी ढूंढना होता है- IAS नूरुल होदा सिविल सेवा परीक्षा-1995 द्वारा मेरा चयन हुआ था और 29 वर्षों की सेवा पश्चात मैंने पिछले साल (पाँच वर्ष पूर्व) नौकरशाही से स्वैक्षिक सेवानिवृत्ति ले ली। इस वर्ष सिविल सेवा के परिणाम आपके सामने हैं। एक हज़ार सफल हुए बाक़ी लगभग दस-बारह लाख असफल। अगर आप परीक्षा के चक्र को समझे तो औसतन दो करोड़ छात्र इस परीक्षा में एक समय में अपनी आहुति दे रहे होते हैं। महानगरों और शहरों में यूपीएससी तैयारी की धूम मची है और अरबों-खरबों का इकोसिस्टम तैयार है। परीक्षा में सफलता दिलाने के नाम पर UPSC फेल कई सज़्जन ख़ुद अरबपति बन गए लेकिन कटु सत्य है कि आपको स्वयं के अलावा कोई भी कोचिंग संस्थान या गुरु आईएएस नहीं बना सकता है। सफल परीक्षार्थियों में 97% से अधिक छात्र अंग्रेज़ी माध्यम के होते हैं जबकि 20-30 छात्र ही हिंदी माध्यम के होते हैं। सफल लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि सबल और शैक्षणिक योग्यता प्रबल होती है। अधिकांशतः स्कूल टॉपर, इंजीनियर, डॉक्टर , प्रबंधन और वित्त अथवा सामाजिक विज्ञान की उच्च शैक्षिनिक योग्यता वाले होते हैं। यहाँ पूरी तरह ‘पूत के पाँव पालने वाला‘ फार्मूला ही लागू होता है, इसलिए ये सोंचना कि कोई जादू या पैरवी काम करती है, अकल्पनीय है। सबसे आसान होता है हवाई किले बाँधना और हिंदी प्रदेश के अधिकांश युवा सिविल सेवा परीक्षा के नाम पर हवाई किले बाँधते हैं। यह परीक्षा ‘शून्य से शिखर’ का सफ़र है जो कक्ष-1 से प्रारंभ होकर स्नातक तक की निरंतरता और कठिनतम परिश्रम का प्रतिफ़ल है। परीक्षा परिणाम आते ही सभी अपनी जाति और समुदाय के उम्मीदवार की लिस्ट बाँटते फिर रहे हैं और मुस्लिम समाज यहाँ भी रवायती तौर पर आगे दिखता है। आप जातिये अंधता और संकीर्णता के चक्कर में यथार्थ से मिलों दूर हैं।आईएएस/आईपीएस अपने आप में एक ‘प्रजाति’ है। इक बार चयन होने के बाद व्यक्ति अपने समाज, जाति, समुदाय और धर्म से पूरी तरह अलग हो जाता है। वो केवल एक संभ्रांत इलीट जाति का हो जाता है। चयनित कुलीन श्रेष्ठ लोगों को तो वर्ण उत्क्रमण की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन वंचित वर्ग वाले सबसे पहले अपने से उच्चतर वर्ण की सफ़ल नायिकाओं में अपनी संगिनी ढूँढते हैं, अन्यथा सामाजिक क्रम में श्रेष्ठ सामर्थवान कुलीन कन्या के हो जाते हैं। आपको लगता है प्रयेक वर्ष 60% से अधिक आरक्षित वर्ग के लोग चयन होते हैं और एक दिन आयेगा जब पूरा ब्यूरोक्रेसी दलितों, शोषितों और वंचितों से भर जाएगा । मूर्खता पूर्ण है ये, क्योंकि सभी सफल अभ्यर्थी परीक्षाफल के साथ ही एक झटके में ‘कुलीन’ बन जाते हैं। बहुजन समाज से प्रत्येक वर्ष नव सृजित neo-elite का वैवाहिक संबंध द्वारा वर्ण-उत्क्रमन और सामाजिक पलायन होता है। सिविल सेवा उच्च वर्गीय कुलीनों का क्लब है जहाँ भर्ती पश्चात केवल एक प्रजाति होती है और वो है- ब्यूरोक्रेसी। बंदा लौट कर कभी अपनी जाति, बिरादरी, रिश्तेदारी और समाज में नहीं जाता है, उसके सारे नाते रिश्ते उस पर बोझ बन जाते हैं । कितने ऐसे सफ़ल लोगों को आपने अपने समाज, बिरादरी और रिश्तेदारों से संबंध बनाते, रखते और निभाते देखा है। कितने ऐसे सेवक हैं जो रिटायरमेंट के बाद अपने समाज के बीच लौट कर गए हैं। आरक्षित वर्ग में चयनित कितने लोगों ने सजातिये विवाह किया जरा कोई गणना तो करा लें । उनका समाज और परिवार वहीं खड़ा है, हाँ वो जरूर उच्च कुलीन श्रेष्ठ बन गए। सिविल सेवा के अपने अनुभव से मैं आपको बताना चाहता हूँ कि- 1. चयन पश्चात् हमारी जाति नहीं होती है- हम सबकी एक ही बिरादरी होती है -नौकरशाह 2. ताजमहल एक रात में नहीं बनता, ये 25 वर्षों की कहानी है। 3. बचपन अगर खेल में बीता है तो सोंचे भी ना, इसके बारे में। 4. स्कूल-कॉलेज के विषयों का गंभीर अध्ययन अनिवार्य है। 5. अंग्रेज़ी अच्छी नहीं है तो आपके सफलता के अवसर अत्यंत सीमित है। 6. सजगता, धैर्य और चिंतन की प्रवृति नहीं है तो अपना समय व्यर्थ बर्बाद ना करें। 7. साधन और धन लगेगा, अगर व्यवस्था नहीं है तो विचार त्याग दें। 8. किसी भी प्रकार ये बेस्ट ऑप्शन नहीं है, जीवन के अन्य अवसर इससे बहुत अच्छे हैं। 9. सेवा के नाम पर भर्ती होकर जीवन में आप सेवा कभी नहीं कर पायेंगे, नेताओं के आगे पीछे जिंदगी कट जायेगी । 10. औरों को आपका मूल्य सबसे अधिक और आपको अपना मूल्य सबसे कम लगेगा। सोंचिए वो दस लाख लोग जिनका सालों के संघर्ष के पश्चात् इस बार नहीं हुआ, वो अब कहाँ जाएँगे । सोशल मीडिया यूपीएससी क्वालीफाई करने वाले ग़रीब, साधनहीन और वंचितों की कहानियों से भरा पड़ा है लेकिन रिज़ल्ट के अंदर तो झांकिये, 10% भी ऐसे लोग नहीं हैं। आपको सपने बेचकर कोई अपनी सात पुश्तों की व्यवस्था कर रहा है । कुछ लोगों को लगता है कि इधर सिविल सर्विसेज हुआ उधर हमारी ग़रीबी छूमंतर - ऐसा नहीं है । गूगल और आमेजन में नौकरी करने वाले 21 साल के युवक की सैलरी का दसवाँ हिस्सा मिलता है, यहाँ। भारतीय समाज के भ्रूण में भ्रष्टाचार है और अगर नौकरशाह भ्रष्ट नहीं तो लोकसेवक को कौन पूछेगा। पूरा समाज चयनित व्यक्ति के इलीट क्लब में शक्तिशाली, अनियंत्रित चमक-धमक के साथ प्रवेश का आडंबर उत्सव मनाता है । इतने कम मासिक वेतन पाने वाले को कोई मंत्री या माफिया करोड़ों की दहेज़ के साथ अपनी बेटी भी क्यों ब्याहे .…… It’s nothing more than a GLORIFIED CLERK. अंग्रेज़ों से विरासत् में मिली लोकतांत्रिक व्यवस्था और सिविल सेवा पतन के पथ पर अग्रसर है.... नुरुल होदा IAS

UPSC में चयनित वंचित वर्ग के बाबुओं का पहला काम अपने से उच्च वर्ण की संगिनी ढूंढना होता है- IAS नूरुल होदा

सिविल सेवा परीक्षा-1995 द्वारा मेरा चयन हुआ था और 29 वर्षों की सेवा पश्चात मैंने पिछले साल (पाँच वर्ष पूर्व) नौकरशाही से स्वैक्षिक सेवानिवृत्ति ले ली।

इस वर्ष सिविल सेवा के परिणाम आपके सामने हैं। एक हज़ार सफल हुए बाक़ी लगभग दस-बारह लाख असफल। अगर आप परीक्षा के चक्र को समझे तो औसतन दो करोड़ छात्र इस परीक्षा में एक समय में अपनी आहुति दे रहे होते हैं। महानगरों और शहरों में यूपीएससी तैयारी की धूम मची है और अरबों-खरबों का इकोसिस्टम तैयार है। परीक्षा में सफलता दिलाने के नाम पर UPSC फेल कई सज़्जन ख़ुद अरबपति बन गए लेकिन कटु सत्य है कि आपको स्वयं के अलावा कोई भी कोचिंग संस्थान या गुरु आईएएस नहीं बना सकता है। सफल परीक्षार्थियों में 97% से अधिक छात्र अंग्रेज़ी माध्यम के होते हैं जबकि 20-30 छात्र ही हिंदी माध्यम के होते हैं।

सफल लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि सबल और शैक्षणिक योग्यता प्रबल होती है। अधिकांशतः स्कूल टॉपर, इंजीनियर, डॉक्टर , प्रबंधन और वित्त अथवा सामाजिक विज्ञान की उच्च शैक्षिनिक योग्यता वाले होते हैं। यहाँ पूरी तरह ‘पूत के पाँव पालने वाला‘ फार्मूला ही लागू होता है, इसलिए ये सोंचना कि कोई जादू या पैरवी काम करती है, अकल्पनीय है। सबसे आसान होता है हवाई किले बाँधना और हिंदी प्रदेश के अधिकांश युवा सिविल सेवा परीक्षा के नाम पर हवाई किले बाँधते हैं। यह परीक्षा ‘शून्य से शिखर’ का सफ़र है जो कक्ष-1 से प्रारंभ होकर स्नातक तक की निरंतरता और कठिनतम परिश्रम का प्रतिफ़ल है।

परीक्षा परिणाम आते ही सभी अपनी जाति और समुदाय के उम्मीदवार की लिस्ट बाँटते फिर रहे हैं और मुस्लिम समाज यहाँ भी रवायती तौर पर आगे दिखता है। आप जातिये अंधता और संकीर्णता के चक्कर में यथार्थ से मिलों दूर हैं।आईएएस/आईपीएस अपने आप में एक ‘प्रजाति’ है। इक बार चयन होने के बाद व्यक्ति अपने समाज, जाति, समुदाय और धर्म से पूरी तरह अलग हो जाता है। वो केवल एक संभ्रांत इलीट जाति का हो जाता है। चयनित कुलीन श्रेष्ठ लोगों को तो वर्ण उत्क्रमण की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन वंचित वर्ग वाले सबसे पहले अपने से उच्चतर वर्ण की सफ़ल नायिकाओं में अपनी संगिनी ढूँढते हैं, अन्यथा सामाजिक क्रम में श्रेष्ठ सामर्थवान कुलीन कन्या के हो जाते हैं।

आपको लगता है प्रयेक वर्ष 60% से अधिक आरक्षित वर्ग के लोग चयन होते हैं और एक दिन आयेगा जब पूरा ब्यूरोक्रेसी दलितों, शोषितों और वंचितों से भर जाएगा । मूर्खता पूर्ण है ये, क्योंकि सभी सफल अभ्यर्थी परीक्षाफल के साथ ही एक झटके में ‘कुलीन’ बन जाते हैं। बहुजन समाज से प्रत्येक वर्ष नव सृजित neo-elite का वैवाहिक संबंध द्वारा वर्ण-उत्क्रमन और सामाजिक पलायन होता है। सिविल सेवा उच्च वर्गीय कुलीनों का क्लब है जहाँ भर्ती पश्चात केवल एक प्रजाति होती है और वो है- ब्यूरोक्रेसी।

बंदा लौट कर कभी अपनी जाति, बिरादरी, रिश्तेदारी और समाज में नहीं जाता है, उसके सारे नाते रिश्ते उस पर बोझ बन जाते हैं । कितने ऐसे सफ़ल लोगों को आपने अपने समाज, बिरादरी और रिश्तेदारों से संबंध बनाते, रखते और निभाते देखा है। कितने ऐसे सेवक हैं जो रिटायरमेंट के बाद अपने समाज के बीच लौट कर गए हैं। आरक्षित वर्ग में चयनित कितने लोगों ने सजातिये विवाह किया जरा कोई गणना तो करा लें । उनका समाज और परिवार वहीं खड़ा है, हाँ वो जरूर उच्च कुलीन श्रेष्ठ बन गए।

सिविल सेवा के अपने अनुभव से मैं आपको बताना चाहता हूँ कि-

1. चयन पश्चात् हमारी जाति नहीं होती है- हम सबकी एक ही बिरादरी होती है -नौकरशाह
2. ताजमहल एक रात में नहीं बनता, ये 25 वर्षों की कहानी है।
3. बचपन अगर खेल में बीता है तो सोंचे भी ना, इसके बारे में।
4. स्कूल-कॉलेज के विषयों का गंभीर अध्ययन अनिवार्य है।
5. अंग्रेज़ी अच्छी नहीं है तो आपके सफलता के अवसर अत्यंत सीमित है।
6. सजगता, धैर्य और चिंतन की प्रवृति नहीं है तो अपना समय व्यर्थ बर्बाद ना करें।
7. साधन और धन लगेगा, अगर व्यवस्था नहीं है तो विचार त्याग दें।
8. किसी भी प्रकार ये बेस्ट ऑप्शन नहीं है, जीवन के अन्य अवसर इससे बहुत अच्छे हैं।
9. सेवा के नाम पर भर्ती होकर जीवन में आप सेवा कभी नहीं कर पायेंगे, नेताओं के आगे पीछे जिंदगी कट जायेगी ।
10. औरों को आपका मूल्य सबसे अधिक और आपको अपना मूल्य सबसे कम लगेगा।

सोंचिए वो दस लाख लोग जिनका सालों के संघर्ष के पश्चात् इस बार नहीं हुआ, वो अब कहाँ जाएँगे । सोशल मीडिया यूपीएससी क्वालीफाई करने वाले ग़रीब, साधनहीन और वंचितों की कहानियों से भरा पड़ा है लेकिन रिज़ल्ट के अंदर तो झांकिये, 10% भी ऐसे लोग नहीं हैं। आपको सपने बेचकर कोई अपनी सात पुश्तों की व्यवस्था कर रहा है । कुछ लोगों को लगता है कि इधर सिविल सर्विसेज हुआ उधर हमारी ग़रीबी छूमंतर - ऐसा नहीं है । गूगल और आमेजन में नौकरी करने वाले 21 साल के युवक की सैलरी का दसवाँ हिस्सा मिलता है, यहाँ।

भारतीय समाज के भ्रूण में भ्रष्टाचार है और अगर नौकरशाह भ्रष्ट नहीं तो लोकसेवक को कौन पूछेगा। पूरा समाज चयनित व्यक्ति के इलीट क्लब में शक्तिशाली, अनियंत्रित चमक-धमक के साथ प्रवेश का आडंबर उत्सव मनाता है । इतने कम मासिक वेतन पाने वाले को कोई मंत्री या माफिया करोड़ों की दहेज़ के साथ अपनी बेटी भी क्यों ब्याहे .…… It’s nothing more than a GLORIFIED CLERK.

अंग्रेज़ों से विरासत् में मिली लोकतांत्रिक व्यवस्था और सिविल सेवा पतन के पथ पर अग्रसर है....

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