पटना के गांधी मैदान में नीतीश कुमार के मुंह खोलते ही उनपर चले सैकड़ों चप्पलें।
पटना के गांधी मैदान में नीतीश कुमार के मुंह खोलते ही उनपर चले सैकड़ों चप्पलें। फिर उन्होंने इस हमले से बचाकर उन्हें कुर्मियों का बड़ा नेता बनाने वाले सतीश कुमार की राजनीति सदा के लिए समाप्त कर दी। नीतीश कुमार बिहार में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना कर 1, अणे मार्ग (सीएम हाउस) से निकल रहे हैं। जो नेता शुरुआत में चुनावी राजनीति से दूर रहने का मन बना चुका हो, शुरू के दो चुनाव हार गया हो वह सीएम की कुर्सी तक पहुंच गया और कुर्सी पर रहने का रिकॉर्ड तक बना गया। नीतीश पहली बार 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़े जिसमें प्रचंड जनता लहर के बावजूद उनकी जमानत जप्त हो गई। दूसरा चुनाव 1980 में लड़े इसमें भी हार गए। 1985 में वे पहली बार विधायक बने। उनके राजनैतिक जीवन का नया अध्याय 1994 में शुरू हुआ, जब जार्ज फर्नांडिस ने जनता दल से अलग होकर 14 सांसदों के साथ समता पार्टी बनाई। इससे पूर्व पटना के गांधी मैदान में कर्मियों के बड़े नेता और सूर्यगढ़ा के तत्कालीन कम्युनिस्ट विधायक सतीश कुमार ने एक जातीय रैली की। इसका नाम दिया गया "कुर्मी चेतना रैली"। कहानी नीतीश को फर्श से अर्श तक पहुंचाने वाले 1994 के इसी कुर्मी चेतना रैली की। यह वही रैली थे, जिसके बाद नीतीश कुमार की राजनीतिक दिशा बदल गई थी। रैली के आयोजकों ने इसमें भागीदारी और सहयोग के लिए नीतीश कुमार से भी संपर्क किया। लेकिन, जीवनपर्यंत दूसरों का पकाया खाने वाले नीतीश को कुर्मी रैली का आइडिया नीतीश ने रैली में सक्रिय हिस्सेदारी और किसी भी तरह के सहयोग से स्पष्ट इंकार कर दिया। फिर भी धुन के पक्के सतीश कुमार ने अपनी तैयारी जारी रखी। वामपंथी विचारों वाले विधायक सतीश कुमार (जिनका 10 मार्च, 2026 को देहांत हुआ) को छोड़ कर इस कुर्मी चेतना रैली से बिहार का कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं जुड़ा। सतीश कुमार पहली बार 1990 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक (सूर्यगढ़ा) बने थे। 1995 में अस्थावां से निर्दलीय और 2001 में समता पार्टी से भी विधायक रहे। बैनरों पर शरद पवार और उमा भारती की तस्वीरें लगाई गईं। इसपर भी इन्हें बाहरी बताकर नीतीश कुमार ने घोर आपत्ति की। दिल्ली से तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष रवि राय आमंत्रित किए गए। सभा के लिए लोगों को जुटाने निकली गाड़ियां और जागरूकता रथ जगह-जगह से गुजरने लगे तो खुफिया विभाग की रिपोर्ट्स में कहा जाने लगा कि रैली में अच्छी-ख़ासी भीड़ जुटने की संभावना है। लेकिन, नीतीश कुमार अभी भी इसे कोई महत्व नहीं दे रहे थे और इसमें यथाशक्ति अड़ंगे डाल रहे थे। अंततः रैली से तीन दिन पहले उन्होंने बयान जारी कर कहा कि वह इसमें भाग नहीं लेंगे। ये रैली को असफल करने का उनका अंतिम दावं था। लालू का नाम लेना पाप है रैली में जब भोला प्रसाद सिंह बोलने आए तो उन्होंने कहा कि लालू का नाम लेना पाप है। उनकी इस बात पर जबर्दस्त ताली बजी। इसके बाद बोलने का अवसर दिया गया नीतीश को। कुर्मियों की इस रैली में नीतीश कुमार पर फेंकी गई थीं चप्पलें। इस रैली के पहले से ही नीतीश और लालू में खटास शुरू हो गई थी। नीतीश अलग भी होना चाहते थे, लेकिन जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘द ब्रदर्स बिहारी’ में लिखा है कि रैली से पहले ही लालू ने नीतीश को एक संदेश भिजवाया था कि यदि वह रैली में गए तो इसे विद्रोह समझा जाएगा। बकौल सतीश कुमार रैली में भारी भीड़ आ गई जिसका अंदेशा नीतीश कुमार को नही था। वे ठीक गांधी मैदान से सटे अपने मित्र बाढ़ के तत्कालीन विधायक विजयकृष्ण के आवास से भीड़ का अंदाजा लगा रहे थे। ज्यों ही उन्हें भारी भीड़ का आभास हुआ उन्होंने तुरंत रैली में नही शामिल होने का फैसला बदला और सभास्थल की की तरफ बढ़ चले। नीतीश मंच पर चढ़े तो भीड़ ने जिंदाबाद के नारे लगाए। लेकिन जब बोलने की बारी आई तो उन्होंने लालू यादव की प्रशंसा के साथ गोलमोल बाते शुरू कर दी। उनकी इस तरह की बेतुकी बात सुन कर भीड़ ने उनकी तरफ सैकड़ों चप्पलों और ढेलों की बारिश शुरू कर दी। तब अफरातफरी के इस माहौल को संभालने सतीश कुमार खुद खड़े हुए और नीतीश को समझाया कि लोग सीधे शब्दों में अपनी बात सुनना चाहेंगे इन्हें गोल-गोल मत घुमाइए। फिर नीतीश ने पलटी मारी और तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू को ललकारने के अंदाज में कहा- भीख नहीं, हिस्सेदारी चाहिए। जो सरकार हमारे हितों को नजरअंदाज करती है, वो सत्ता में नहीं रह सकती है। और इसके बाद जिस नीतीश ने रैली के लिए कुछ नही किया, उन्होंने रैली को पूरी तरह से हाइजैक कर लिया और उसी दिन से सतीश कुमार की राजनीति की जड़ों में मट्ठा डालना शुरू कर दिया। फिर इसके बाद पीछे मुड़कर नही देखा। इसके बाद खुद मजबूत होने के साथ ही इतना बड़ा अपना मंच देकर बड़ा नेता बनाने वाले सतीश कुमार की राजनीति को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया। इसका अफसोस सतीश कुमार को ताउम्र रहा। इसके बाद कई दलों में अपनी जगह बनाने का प्रयास करते रहे बेबाक और जुझारू स्वभाव के व्यक्ति सतीश कुमार का राजनीतिक गुमनामी में पिछले 10 मार्च को देहावसान हो गया।
नीतीश कुमार बिहार में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना कर 1, अणे मार्ग (सीएम हाउस) से निकल रहे हैं। जो नेता शुरुआत में चुनावी राजनीति से दूर रहने का मन बना चुका हो, शुरू के दो चुनाव हार गया हो वह सीएम की कुर्सी तक पहुंच गया और कुर्सी पर रहने का रिकॉर्ड तक बना गया।
नीतीश पहली बार 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़े जिसमें प्रचंड जनता लहर के बावजूद उनकी जमानत जप्त हो गई। दूसरा चुनाव 1980 में लड़े इसमें भी हार गए। 1985 में वे पहली बार विधायक बने। उनके राजनैतिक जीवन का नया अध्याय 1994 में शुरू हुआ, जब जार्ज फर्नांडिस ने जनता दल से अलग होकर 14 सांसदों के साथ समता पार्टी बनाई। इससे पूर्व पटना के गांधी मैदान में कर्मियों के बड़े नेता और सूर्यगढ़ा के तत्कालीन कम्युनिस्ट विधायक सतीश कुमार ने एक जातीय रैली की। इसका नाम दिया गया "कुर्मी चेतना रैली"।
कहानी नीतीश को फर्श से अर्श तक पहुंचाने वाले 1994 के इसी कुर्मी चेतना रैली की।
यह वही रैली थे, जिसके बाद नीतीश कुमार की राजनीतिक दिशा बदल गई थी। रैली के आयोजकों ने इसमें भागीदारी और सहयोग के लिए नीतीश कुमार से भी संपर्क किया। लेकिन, जीवनपर्यंत दूसरों का पकाया खाने वाले नीतीश को कुर्मी रैली का आइडिया नीतीश ने रैली में सक्रिय हिस्सेदारी और किसी भी तरह के सहयोग से स्पष्ट इंकार कर दिया। फिर भी धुन के पक्के सतीश कुमार ने अपनी तैयारी जारी रखी।
वामपंथी विचारों वाले विधायक सतीश कुमार (जिनका 10 मार्च, 2026 को देहांत हुआ) को छोड़ कर इस कुर्मी चेतना रैली से बिहार का कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं जुड़ा। सतीश कुमार पहली बार 1990 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक (सूर्यगढ़ा) बने थे। 1995 में अस्थावां से निर्दलीय और 2001 में समता पार्टी से भी विधायक रहे।
बैनरों पर शरद पवार और उमा भारती की तस्वीरें लगाई गईं। इसपर भी इन्हें बाहरी बताकर नीतीश कुमार ने घोर आपत्ति की। दिल्ली से तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष रवि राय आमंत्रित किए गए। सभा के लिए लोगों को जुटाने निकली गाड़ियां और जागरूकता रथ जगह-जगह से गुजरने लगे तो खुफिया विभाग की रिपोर्ट्स में कहा जाने लगा कि रैली में अच्छी-ख़ासी भीड़ जुटने की संभावना है। लेकिन, नीतीश कुमार अभी भी इसे कोई महत्व नहीं दे रहे थे और इसमें यथाशक्ति अड़ंगे डाल रहे थे। अंततः रैली से तीन दिन पहले उन्होंने बयान जारी कर कहा कि वह इसमें भाग नहीं लेंगे। ये रैली को असफल करने का उनका अंतिम दावं था।
लालू का नाम लेना पाप है
रैली में जब भोला प्रसाद सिंह बोलने आए तो उन्होंने कहा कि लालू का नाम लेना पाप है। उनकी इस बात पर जबर्दस्त ताली बजी। इसके बाद बोलने का अवसर दिया गया नीतीश को।
कुर्मियों की इस रैली में नीतीश कुमार पर फेंकी गई थीं चप्पलें।
इस रैली के पहले से ही नीतीश और लालू में खटास शुरू हो गई थी। नीतीश अलग भी होना चाहते थे, लेकिन जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘द ब्रदर्स बिहारी’ में लिखा है कि रैली से पहले ही लालू ने नीतीश को एक संदेश भिजवाया था कि यदि वह रैली में गए तो इसे विद्रोह समझा जाएगा।
बकौल सतीश कुमार रैली में भारी भीड़ आ गई जिसका अंदेशा नीतीश कुमार को नही था। वे ठीक गांधी मैदान से सटे अपने मित्र बाढ़ के तत्कालीन विधायक विजयकृष्ण के आवास से भीड़ का अंदाजा लगा रहे थे। ज्यों ही उन्हें भारी भीड़ का आभास हुआ उन्होंने तुरंत रैली में नही शामिल होने का फैसला बदला और सभास्थल की की तरफ बढ़ चले। नीतीश मंच पर चढ़े तो भीड़ ने जिंदाबाद के नारे लगाए। लेकिन जब बोलने की बारी आई तो उन्होंने लालू यादव की प्रशंसा के साथ गोलमोल बाते शुरू कर दी। उनकी इस तरह की बेतुकी बात सुन कर भीड़ ने उनकी तरफ सैकड़ों चप्पलों और ढेलों की बारिश शुरू कर दी। तब अफरातफरी के इस माहौल को संभालने सतीश कुमार खुद खड़े हुए और नीतीश को समझाया कि लोग सीधे शब्दों में अपनी बात सुनना चाहेंगे इन्हें गोल-गोल मत घुमाइए। फिर नीतीश ने पलटी मारी और तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू को ललकारने के अंदाज में कहा- भीख नहीं, हिस्सेदारी चाहिए। जो सरकार हमारे हितों को नजरअंदाज करती है, वो सत्ता में नहीं रह सकती है। और इसके बाद जिस नीतीश ने रैली के लिए कुछ नही किया, उन्होंने रैली को पूरी तरह से हाइजैक कर लिया और उसी दिन से सतीश कुमार की राजनीति की जड़ों में मट्ठा डालना शुरू कर दिया। फिर इसके बाद पीछे मुड़कर नही देखा। इसके बाद खुद मजबूत होने के साथ ही इतना बड़ा अपना मंच देकर बड़ा नेता बनाने वाले सतीश कुमार की राजनीति को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया। इसका अफसोस सतीश कुमार को ताउम्र रहा। इसके बाद कई दलों में अपनी जगह बनाने का प्रयास करते रहे बेबाक और जुझारू स्वभाव के व्यक्ति सतीश कुमार का राजनीतिक गुमनामी में पिछले 10 मार्च को देहावसान हो गया।
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